कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७
जीवधर्मबोध
(१९३५)
बांदी विलपत देखा रानी । रुदन बिलाप सोऊ तब ठानी ॥ राजा जब निज महलमें आया । रुदन करत रानीको पाया ॥ रानी रोवै सोढर कहि ताहा । सुनि सो रुदन रोवै नरनाहा ॥ राजा रुदनकरन जब लागा । नग्र नारि नर धीरज त्यागा ॥ सकल नग्रमें परा खँभारा । नृप मंत्री तब तहँ पग धारा ॥ मंत्री नृपते बचन उचारी । कारन कहा रुदन भो भारी ॥ तब नरनाथ बचन अस कहेऊ । दुखी सकल सोढर मरि गएऊ ॥ सोढर कौन सो मन्त्री बूझा । तब नृप कहौ मोहि नहिं सूझा ॥ रानी को मैं रोवत देखा । कीन्हौ मैं पुनि सोई लेखा ॥ रानीते जब पूछा जाई । सोढर कौन सो देहु बताई ॥ रानी कहे न जाने सोढर । मैं रोई बांदीके औढर ॥ जब पूछै बांदीसे जाई । सोढर कौन कहा बतलाई ॥ बूषली बोले मैं नहिं जानी । धोबिन देखि रुदन मैं ठानी ॥ धोबिन कह मोर धोबी रोई । सो लखि सोग मोहिको होई ॥ धोबीसे जब पूछा जाई । सोढर गढ़ा नाम बताई ॥ ऐसेही अंधा संसारा । देखा देखी कर्म पसारा ॥ जिनके हृदये माह बिचारा । सो नहिं लीकलीक पग धारा ॥ दोहा-लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत ॥ तीन लीकमें नहिं चले, सूरा सन्त सपूत ॥
चौपाई
जगमें कतहुँ न तुर्क न हिंदू । सकल देखिये नाद अरु बिंदू ॥ जेते नाद बिंदु मय बंदा । सबही कर्मके फंदमें फंदा ॥ जैसो कर्म करे जो कोई । तैसोई फल पावै सोई ॥ कर्म कुरूप स्वरूप सँवारा । कर्महि ऊँच नीच गति डारा ॥ कर्महि दुःखसुख जीव भोगावै । कर्महि सकल योनि भरमावै ॥