कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९
जीवधर्मबोध
(१९३७)
साखी-आसन साधे आपमें, आपा डारे खोय । कहैं कबीर सो योगी, सहजे निर्मल होय ॥
कुण्डलिया
मानुष है नहिं कोई सुवा, सुवा सो डंगर ढोर । चौरासी भर्मत फिरे, टूटै न कर्मकी डोर ॥ टूटै न कर्मकी डोर, भोर बुधि जहाँ तहैं भटके । लहे न ज्ञान अन्नप, रूप भवमें पुनि पटके ॥ पुनि पुनि पटके काल, कर्म बेरी पग भारी । वचन कह यक मृग चोट, जहां लख कोट शिकारी ॥
चौपाई
कृपा करे गुरु धनी दयाला । जीवहि खच लोक ले चाला ॥ ताकी कृपा योग जब होना । लगे मही तब कालको टोना ॥ कृपा योग जबलों नहिं लोई । कृपा कौनविधि तापर होई ॥
सत्यकबीर वचन
धर्मदास तोहि लाख दोहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ॥ सारशब्द बाहर जो परि है । बिचलै पीढी हंस नहिं तरि है ॥ युगन युगन तुम सेवा कीनी । ता पीछे हम इहां पगदीनी ॥ कोटिन जन्म भक्ति जब कीन्हा । सारशब्द तबही पै चीन्हा ॥ अंकुरी जिव होय जो कोई । सारशब्द अधिकारी सोई ॥ सत्यकबीर प्रमाण बखाना । ऐसो कठिन है पद निर्वाना ॥ पै दुतिये विधि कह्यो बहोरी । जापर सदगुरु कृपा न थोरी ॥ धर्मदास प्रति ऐसे कहेऊ । मांगु जो कछु तेरो चित चहेऊ ॥ धर्मदास तब वचन उचारा । तारो मोहि सहित परिवारा ॥ पिता पितामह सरखा समेता । सबहि पारकर कृपानिकेता ॥