भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९३९ )

यक भ्रम दीप जो दियो बुझाई । सकलो भास नाश है जाई ॥ ऐसे एकते भयौ अनेका । बहुरि अनेक एकही एका ॥ यहि विधिसकलजक्त यहलागा । जस भ्रम दीप कांचगृह जागा ॥ ज्ञान उदयते रहै न कोई । यथा नखतगण जलमें जोई ॥ जल सूखे नहीं दरसै तारे । कोई नहीं देखजात किहि द्वारे ॥ ऐसेहि सकल जक्त यह थापा । सबमें शोभित आपै आपा ॥ ब्रह्म सब देसी लख ऐसे । यथास्फटिकमणि देखी तैसे ॥ यही स्फटिक मणिकेर सुभाऊ । जहँजसमतितसगति दरसाऊ ॥ जौन रंग तेहि सन्मुख आना । गहै स्फटिक मणि सोई बाना ॥ कर्मरंग जाट्टंग सघट्टा । देखफटिक मणिमें सोई ठट्टा ॥ राता पीता आदिक रंगा । होयस्फटिकमणि को सोई ढंगा ॥ सर्वांगी अस ब्रह्म बखाना । कर्म बनाव अनेक विधाना ॥ जहँ जसकर्म तहां तस भासू । सो निरलेप है स्वतह प्रकासू ॥ कर्मडोरि जबलों नहीं तोरे । अपनो रूप न पावै भोरे ॥ कर्मबंधते अलग जो होई । परम सोहावन उज्जल सोई ॥ कर्मसूतमें बंधा जो रहई । नाना रंग ढंग गुन गहई ॥ जेते धर्म जक्तके मांही । सबमें सोई ब्रह्म दरसाही ॥ जो दरसै सो सब भ्रम भासा । नहीं दरसै तेहि कौन प्रकाशा ॥ जो नहीं कहन सुननमें आवै । ताको कथा कौन कहि गावै ॥ मन बानीकी गम जहँ नाही । पुनि मनबानी किमि कहताही ॥ नैनते सकल जक्त दरसाई । पै निज रूप न सो लखिपाई ॥ देखे आंख सुने सब काना । रसना रसिक गंध गह ब्राना ॥ त्वचा स्पर्श तेहीको अहई । सबइंद्री निज निज कर्म गहई ॥ आंखिन रशनाको गुन जाना । स्वाद भेद नहीं सो पहिचाना ॥ कान न कबहु रूपको देखे । नाक न कबहु स्पर्शको लेखे ॥

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