भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधमबाध

( १९९९ )

जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥ भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥ जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥ सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥ छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥ विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥ दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥ ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥

इति

अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥ सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥ व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥ सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥ सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥ साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥ इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥ जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥ प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥ आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥

सत्यकवीर वचन-शब्द

भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान । भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥ भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।