कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २०२८ )
बोधसागर
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कछु नहीं ताको बस तहँ चाला। अंतकाल तेहि नकीमें डाला ॥ जीवकि वसमें जो कछु रहता। तौन सुकर्म नीच गति गहता ॥ वेशुवा बहुदिनको लेआयो। ईश्वर कृपा ताहि परछायो ॥ जबकन आनदेशमें आया। तह बल्लाम साधु यक पाया ॥ तीनसौ वर्ष कीन तप जोई। जो कछु कहै सत्य सब होई ॥ बाद येशुपासे सो ठानी। तीनसौ वर्षकी तप विनसानी ॥ जब जहि जस चाहे तस करई। जीव जतन कछु काज न सरई ॥ किनको नाथ दीन बरदाना। निज भ्राता पर हो जय माना ॥ जीत्यौं प्रभु आज्ञा अनुसार। कोई न भा दोषी हत्यारा ॥ मूसा प्रभुकी आज्ञा पावो। चलि फिर उन भूप समुझावो ॥ देय यहूदिनको सो जाना। पुनि अस वचन कहौं भगवाना ॥ मैं फिर उनको करों कठोरा। मूसा वचनसे मुख सो मोरा ॥ फिर उनहिय प्रभुकरि कठिनाई। मूसाको तब कहा बसाई ॥ को अस बली जो ताहि उबारा। प्रभु जेहि आप डुबावन हारा ॥ जैसे प्रथम भन्यकी बानी। हसन हुसेन मृत्यु इमि जानी ॥ कीन हुसेन युक्ति बहु तेरी। पहुंचे मृत्यु महि मरनकी बेरी ॥ यकदिन अस कौतुक बतलाये। महम्मद द्वै किताब ले आये ॥ यक किताब दहने कर गहई। दूजी बाम हाथमें रहई ॥ दहने हाथ किताब जो दिखावा। नाम बिहिस्तिनकोतहँलिरकवा ॥ जो किताब बायें कर ग्राही। नारख नाम लिखा तामाही ॥ प्रथमहिंते भे स्वर्गी नकीं। कुदरतकी गति जाय न तकीं ॥ प्रभु केकइकी मनि हरि लीनो। रामचंद्रको सो बन दीनो ॥ केकइको कह दूषन दीजै। हरिइच्छा किन अटक कहीजै ॥ बाबुल बुर्ज बनावन लागे। सब नर तिय तेहि उद्यम पागे ॥ ताते नहीं ईश्वर सुखपाई। सबकी बोल दियौ पटलाई ॥ बरने बेद उपनिषद साखी। देव दनुज दोऊ दल रन भाखी ॥