कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २०५६ )
बोधसागर
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लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥ जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥ सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥ पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥ जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥ पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥ जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥ जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥ जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥ जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥ अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥ नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥ नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥ तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥ जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥ सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥ इति जीवधर्मबोध समाप्त