कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
सो०-धन्य राय सुज्ञान, आनहु ताहि हंस ॥ तुम गुरुदयानिधान, भूपति बंद छुड़ाइये ॥६८॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुन ज्ञानी बहुतै विहँसाये । चले तुरंग बार नहिं लाये ॥ गढगिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधी नियराया ॥ घेरेचो ताहि लेन यमराई । राजहि देत कष्ट बहुताई ॥ राजा परे गाढ़ महाँ आया । सतगुरु कहै तहाँ गुहराया ॥ घोड़े नृप नाहीं यमराई । ऐसे भक्ति चूक है भाई ॥ भक्ति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर यम करे विहाला ॥ चन्द्रविजयका करगहि लीन्हा । तत्क्षण लोक पयाना दीन्हा ॥ रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती के सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥
राजा चन्द्रविजय वचन
राय कहैं सुनु हंस सुजाना । वरण तोर षोडश शशिमाना ॥ अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहाँ तोहि मैं नारी ॥ तुम तो भक्त कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥ धन्य गुरु अस भक्ति दृढ़ाई । तोरि भक्ति हम निज घर पाई ॥ कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥ हम तो राजकाज मनलाया । सतगुरु भक्ति चीन्ह नहिं पाया ॥ जो तुम मोरि होत ना नारी । तो हम जात नरककी खानी ॥ तुवगुण मोहि वरणि ना जाई । धनगुरु धन्य नारि हम पाई ॥ जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैसे मिले सकल संसारी ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
मुनत वचन ज्ञानी वहसायी । चन्द्रविजय कहैं वचन मुनायी ॥