कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १०६ )
अनुरागसागर
सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥ तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
सुपच वचन
कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥ बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥ मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥ बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥ भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥ अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥ आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥ ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥ हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥ और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥ सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥ सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥
सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा
सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा । दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥ कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥ बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥ अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥ तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥ बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥