भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( १७ )

रजगुन भाव ब्रह्मा उत्पानी । सतगुन भाव विष्णु कोजानी ॥ तमगुन भाव रुद्र का लेखा । तीनों गुन तिय अंड विशेषा ॥ जब देवी तिन सुत उत्पाने । धरमराय निद्रा अलसाने ॥ सोवत चार युग गय बीती । इक युग प्रथम अंड सौ प्रीती ॥ उठि जागै कोइ जान न भेदा । ताकी स्वांस तैं चारौं वेदा ॥ स्तुति वेद कियो पुनि तहैंवा । चतुर रूप विधाता जहैंवा ॥ मीन रूप जो कीन्ह बनाई । तीन छोड़ि रह चौथे ठाई ॥ जो तुम संशय करहु धर्मदासा । वेद चरित्र अब कहौं प्रकाशां ॥ कूर्म चाव कियोकालअन्याई । बुंद प्रसेद तहाँ पुनि पाई ॥ एक बुंद धरती परगासा । दूसरा बुन्द घट माहीं नितासा ॥ बुंद प्रभाव वेद भये ताही । ऐसे बुन्द की उत्पति आही ॥ और चरित्र जस कीन्ह भवानी । सो अब तुमसौ कहा बखानी ॥

सारखी-तीन देव जब ऊपजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ कर जोरे स्तुति करें, तैं अब कहौं संदेश ॥ आज्ञा कह मोहि माता, सोइ कहौं समुझाइ ॥ सोई करब हम निहचै, बोले तीनौ राइ ॥

ब्रह्मा करहु तुम सृष्टि उरेहा । जात जीव धरैं सब देहा ॥ कैसे करहि सो युक्ति बतावहु । क्रिया करहु जनिमोहि दुरावहु ॥ सतगुन पहिले भयो उत्पानी । तैंतिस कोटी देव बखानी ॥ रजगुन तमगुन अंड जो भयऊ । दैत्य अनेक तबहि निरमयऊ ॥ दैत्य देव सों होय संग्रामा । जो मैं कहौं करब सो कामा ॥ जाय खनावहु सागर साता । जातैं दैत्य न करें उत्पाता ॥ सागर नीर करौ उत्पानी । जाते दैत्य गति रहै भुलानी ॥ रचौ सिन्धु जल होय अपारा । तब कहि हौं आगिल व्यौहारा ॥