भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( २५ )

अहो पुरुष का करब उपाई । पृथ्वी भार बहुत अकुलाई ॥ ततक्षण भई अकाश ते वाणी । सुनहु विष्णु कर सबकी हानी॥ शिव विहाय चौदह सुत मोरा । इन्हें छांडकर शंकर ओरा ॥

सारखी-जाहु पृथ्वी घर अपने, करौं चरित अब सोय ॥ भार उतारो मही को, आज्ञा अस जो होय ॥

चौपाई

चली आय वसुधा निज गेहा । जमन विष्णु तब कीन्ह सनेहा॥ मारहु जारहु अब जिव जन्तू । सुन अन्तक सुन भयो अनंतू॥ आई पावक तब रखना लीन्हा । सबजिवमार विष्णु कहदीन्हा॥ मारे देव तैंतीस करोरी । ब्रह्मा मार मही सब घोरी ॥ कीन्हो युग निकंद भयो जबही । जुग निकंद विष्णु कियौ तबही॥ सब जीव घाल आप में लीन्हा । प्रथम स्वभाव जमन तब कीन्हा॥

सारखी-सवा लक्ष जीव विष्णु ते, चले जात नित नेम ॥ जस अनाज की कोठरी, करि कृषानु बहु प्रेम ॥

चौपाई

ले अनाज कोठी वहरावै । खरच लेइ पुन फेर सुदावै ॥ अस चरित्र कियो अन्त कराऊ । अबकछु भाखौ अगिल स्वभाऊ॥ विष्णुहिं सैं सतभाव जो देखा । छांडो अंश करौं सृष्टि उरेहा ॥ सतगुण भाव विष्णु कौ जानी । नाभि कमल ब्रह्मा उत्पानी ॥ ततक्षण ब्रह्मा गयो अकाशा । विष्णु ध्यान अस वचन प्रकाशा॥ येहो स्वामि निरंजन राया । वसुधा कैसे करौं उपाया ॥ बारी सहित मही जो बोरी । प्रकट करन की युक्ति है थोरी ॥ रजगुन भयो जो ब्रह्मा निवासा । ताकी नाभि से पवन प्रकाशा॥ तीनौं गुन तिय अंड जो भयऊ । दैत्य देह तिन दोनों धरेऊ ॥ उठि ठाढे नहिं पावहिं थाहा । गये जहां तहैं प्रभु अवगाहा ॥