भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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विवेकसागर

टीका-शीलने मोहकी सभामें कहा कि, हे चतुर राजा मोह ! किस कारणसे आपने विरोध ठाना है सो कहिये, आपको तो सब भाइयोंके साथ मिलकर पूर्ण शक्तिके साथ राज्य करना चाहिये ! देखिये तो-

मन राजा तुवतात त्रिभुवनपति स्वामिया ॥

शुभ अरु अशुभको कारण अन्तर्यामिया ॥

अनुमादिक अनुगामि अनुज त्रिदशपति ॥

तेहिके सुत कुमति कहा कीनी गति ॥

टीका-आपके पिता मनराजा जो हैं सो स्वर्ग (सत्तेगुण) मृत्युलोक (रजोगुण) और पाताल (तमोगुण) के राजा हैं तीनों लोकमें उनका आन फिरता है । और वही मनराजा शुभ अशुभ दोनोंका कारणस्वरूप हो अन्तर्यामी बना हुआ है ? हे मोह राजा ! आपके पिता आपके पीछे २ सदा आपको मद (काम) देते रहते हैं और जहाँ २ आप जाते हो सदा आपके पीछे वह भी जाते हैं । और आपके पिताका जन्म आपके पश्चात् होकर तेरहों भुवनके राजा बनते हैं । ऐसा समर्थ राजा मन उसके पुत्र होकर आपने यह कुमति क्यों ठानी है ।

अनुमादिक शब्द अनु और मादिक शब्दोंके संयोगसे बना है इसका अर्थ है अनु = पीछे । मादिक = मद करनेवाला अर्थात् पीछे जो मद अर्थात् काम करे उसे कहते हैं अनुमादिका । यहाँ मन जब प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब मोहकी प्रबलता होती है । मोहकी प्रबलता होने पर मन सदा उसको सहायता देता है ।

अनुगामी शब्दका अर्थ है पीछे चलनेवाला, जब मन प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब सदा मोहके पीछेही पीछे दौड़ता रहता है अर्थात् जहाँ मोह दृढ़ होता है वहाँही मन भी लुब्ध होता है उससे अलग नहीं होता ।

अन्तर्यामी कहिये सवके अन्तर अर्थात् अन्तःकरण का जाननेवाला हो ।