भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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विवेकसंगर

(११५)

के मरने से ऐसी चिन्तामें क्यों डूबे हुए हैं। देखिये प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि, अभी संग्राममें जाकर विचार विवेक सहित उसकी समस्त सेनाका नाश करके आपका राज्य निष्कंठक बना दूंगा। आप किसी प्रकारकी भी चिन्ता न करें। इस प्रकार अपनी बड़ाई आपही करके रणभूमिमें जाकर उपस्थित हुआ।

दोहा-मोह भूप यह सुनतहि, होगया व्याकुल अंग ॥

बूझे मन्त्रिन से यहै, जूझे बन्धु अनंग ॥

बड़ो सुभट मोसे नमो, हुतो सहस कन्दर्प ॥

मो जावत सो हत गयो, हुस्तर कठिन जो सर्प ॥

महामोहको वचन सुनि, मोह उठयो गण गाजि ॥

मेरे बन्धुहि मारिके, कित जैहैं रण भाजि ॥

मेटौं मारि विवेकमन, ज्ञाने देहुँ बहाय ॥

शील सत्य संतोष सब, चितवत जाहि पराय ॥

हौं जब प्रगटो तेज है, संग पुत्र मम चार ॥

व्याकुल करि वैराग्यको, हरौं भक्ति परिवार ॥

असत्संग मन्त्री कहै, हे प्रभु बडभट क्रोध ॥

आयुस जाको दीजिये, विजय करै रण बोध ॥

हरण्यो मोह नरेश तब, सुन्यो क्रोध बल शूर ॥

आज्ञा तब रणको दर्द, करौ रिपुहि चकचूर ॥

चल्यो क्रोध वंदन कियो, प्रभु आज्ञा धरि माथ ॥

आइ गयो रणभूमिमें, दलबल लीन्हैं साथ ॥

टीका-क्रोधका रणमें आगमन सुनकर विवेक राजाने भी विचार करके अपना योद्धा भेजा ॥

तब विवेक क्षमा कहैं आयसु दीन्हिया ॥

सुभट दोऊ संग्राम समागम कीन्हिया ॥