कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( ३३ )
साखी-अहो ऋषि तुव सुत कहैं, दशरथ मारचो बाण ॥
यह चरित्र सुन सुनिवर, तत्क्षण छांड्यो प्राण ॥
दोनों ऋषी काल बस भयऊ । नृप अन्याय बैर हरि ठयऊ ॥
सुत बिहून जस ऋषितन त्यागा । तैसे काल नृप तोर अभागा ॥
पुत्रके शोक काल होय तोरा । देहू बैर कहा सुन मोरा ॥
नारद ऋषि तब कीन्ह तिवाना । राजा दक्ष यज्ञ जो ठाना ॥
देव ऋषी आये तिहि ठाई । सब नृप बहुते सेवा लाई ॥
ऋषि तब कहै सुनो दक्ष राऊ । शिवको जियत निवत बुलवाऊ ॥
इन्द्र यज्ञ जब निवत जु आये । गण गन्धर्व सब देव रहाये ॥
तहाँ शिव कीन्ह तोर अपमाना । आई कहौ सुन नृपति सुजाना ॥
सुनतहि क्रोध नृप पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-शिव विहाय सब निवते, चलै सबै तिहि पास ॥
देख गगना सुनि वरन को, सती वचन परकास ॥
चोपाई
हे प्रभु कहाँ जायैं सुनि राई । सो प्रभाव प्रभु मोहि बताई ॥
राजा दक्ष यज्ञ जो ठाना । तहाँ जायैं ऋषि चढे विमाना ॥
हे प्रभु मो कहैं आयसु होई । यज्ञ तात कर देखौ सोई ॥
निवते बिन न बूझियत नारी । ऐसी इच्छा आहि तुम्हारी ॥
चली सती तब लागि न बारा । पिता भवन तहैंवा पगु धारा ॥
देखत नृपति महा उर जरेऊ । काहू समाधान नहिं करेऊ ॥
व्याकुल भई दिगम्बर नारी । यही ब्याह मम कुल भई गारी ॥
सुनत विषाद सती मन जागा । परी अनल तब देही त्यागा ॥
हाहाकार भयो सभा मझारी । यज्ञ विध्वंस भयो सुन चारी ॥
हिमाचल गृह सती अवतरिया । गणदीन्ह नाम पारवती धरिया ॥
यहै चरित्र विष्णु जब देखा । शिव विवाह गुण मनमें पेखा ॥