भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सर्वज्ञसागर

( १४३ )

भली भांति सो लेहु विचारी । सकल अंचारज मतहिं सुधारी ॥ खरा खोट जो परखा नाही । अन्धा धोखे मूल नशाही ॥ प्रथम विचारहु औषध रोगा । केहिविधि शब्द हरे सब सोगा ॥ देखो शब्द प्रकाश विचारी । जाते सकल होय उजियारी ॥ गुरु एक सो कौन कहावे । जासो आवागमन नशावे ॥ सेवा अनेक करिय केहि केरा । विन जाने सब धुन्ध अन्धेरा ॥ गुरु मत मनमत करे विचारा । सो जिव निज करे निरुआरा ॥

सारखी-विन देखे नहिं देशकी, बातें कहै सो क्रूर ॥ आपै खारी खात है, बेचत फिरे कपूर ॥

चौपाई

औषध पांच राह सब करई । औषध विना न कोई सहई ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा । द्वारा पंच औषधिकी सन्धा ॥ सबहीं द्वार बूझ रहायी । बिन बूझे नहिं कोइ ठहरायी ॥ कोइ झीना कोइ मोटा द्वारा । तैसहिं तासु भिन्न व्यवहारा ॥ झीना शब्द है पवन स्वरूपा । तासो मोटा अनलको रूपा ॥ अनलहु ते जल मोटा होई । जलते मोटी पृथ्वी है सोई ॥ पुनि प्रकाश एकते एका । थिर होइ देखे करे विवेका ॥ पृथ्वी मोटी आँख प्रकाशी । तासे मध्यम दृष्टि प्रवेशी ॥ दृष्टीसे जल झीना होई । भीतर जो है दीसे सोई ॥ जलसो झीन तेज प्रकाशा । जामे परशे धरति अकाशा ॥ रूपसो अधिक शब्द उजियारा । दृष्टिमें आवे सब संसारा ॥ भूत भविष्य जो हो वर्तमाना । शब्द भीतरे सबै समाना ॥ बूझ शब्द में पेठे जायी । शब्दके भीतर अनल रहायी ॥ अनल मध्य होयके जल देखा । जलके भीतर पृथ्वी पेखा ॥

१ आचार्य, धर्मप्रवर्तक ।