कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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सर्वज्ञसागर
(१४७)
पूरा धनी पूरा सो सौदा । परखत मेंटे कालको फन्द । ॥ संधि लखावहि कारण रोग । मेंटहिंसब विधि संधिकसोग । ॥ नहि सन्देह न यमके त्रासा । सदा मुखारी परख विलासा ॥ धन्य सोबूझि समुझि पग धरई । अँधरन भटक भटक भवपरई ॥
साखी-बलिहारी तेहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥ सार्ई दीन्हों खांडको, खारी बूझ गवॉर ॥ करु बन्दगी विवेक की, भेष धरे सब कोय ॥ सो बन्दगी वहि जानदे, जहँ शब्द विवेक न होय ॥ मानुष देही पाइके, चूके अबकी घात ॥ जाइ परे भवचक्रमें, सहे घनेरी लात ॥
इति । मानुष विचारसे.
इति तृतीयखण्ड समाप्त