भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 461

बोधसागर

(१७)

वो प्रभु अविगत अविनाशी । दास कहाय प्रगट भे काशी ॥ भाषिन निरगुण ज्ञान निनारा । वेद कितेब कोइ पाव न पारा ॥ तीन लोक महाँ महतो काला । जीवन कहैं यम करै जँजाला ॥ वे यमके सिर मर्दन हारे । जनहि गहै सो उत्तै पारे ॥ जहाँ वो रहहि काल तहाँ नाही । हंसन सुखद एक यह आहीं ॥

धर्मदास बचन

अहो साहब बलि बलि जाऊँ । मोहिं उनके सँदेश सुनाऊँ ॥ मोरे तुम उनहीं सम भाई । तुम वै एक नाहिं विगराई ॥ नाम तुम्हार काह है स्वामी । सो भाषहु प्रभु अन्तर्यामी ॥

सतगुरु बचन

धर्मनि नाम साधु मम आही । सन्तन माँह हम सदा रहाही ॥ साधूसंगति निशिदिन मन भावै । सतगुरु ज्ञान साधु मिलि गावै ॥ जो जिव करै साधु सेवकाई । सो जिव अति प्रिय लागै भाई ॥ हमरे साहिबकी ऐसन रीती । सदा करहिं साधुन सो प्रीती ॥ जो जिव उन्हकर दिशा लेहीं । साधू सेव सिखावन देहीं ॥ जीव दया पर आतम पूजा । सद्गुरु भक्ति देव नहिं दूजा ॥ सद्गुरु सङ्कट मोचक आहीं । निरगुण भक्ति छुवैं यम नाहीं ॥

छन्द-है आपु सत्यकबीर सद्गुरु प्रकट कहु तुम सना ॥ सत्यनाम भक्ति हठावहिं दया क्षेम निश्चल मना ॥ मन कर्म भर्म अबाट परिहरि बाट घरको देत हैं ॥ जो शीश अरपे भव तरे सार जेहि यह लेत हैं ॥

साखी-सुनहु संत मति धीर, हृदया करहु विवेख ॥ हो ज्ञाता परखहु हिये, संत असंतको रेख ॥

सोरठा-जीवन यम धरिखाय, सत्यनाम जाने बिना ॥ वाचै एक उपाय, सत्यकबीर कहि भव तरे ॥