भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(४४)

ज्ञानप्रकाश

चौपाई

सर्वानन्द मगन मन भयऊ । पै उत्तर कछुओ नहि दियऊ ॥ पुनि लागे जल अरपे सोई । चित निश्चल छल एक न होई ॥ हम जल उलिचन लागु करारे । सर्वानन्द पुनि मोहिं निहारे ॥

सर्वानन्द वचन

कहैं सर्वानन्द सुनहु कबीरा । काह कवन उलिचन हौ नीरा ॥

कबीर वचन

कहैं कबीर सुनु विप्र सुजाना । फुलवारी गुरु केर सुखाना ॥ तेहि सींचन कहैं पठइन्हि नीरू । सुनु पण्डित अस कहहिं कबीरू ॥

सर्वानन्द वचन

कह सर्वानन्द यह अनरीती । बात अगम भाषहु विपरीती ॥ कहाँ धौं फुलवारी है भाई । जल सुरसरि महाँ रहै समाई ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु पण्डित राजू । तुम्ह जल उलिचौ कौने काजू ॥

सर्वानन्द वचन

कहा सर्वानन्द सुनहु गोसाईँ । देव पितर जल तृषित अघाई ॥

कबीर वचन

हो सर्वानन्द कहहु यह मोहीं । कहा पितर तुव पूछों तोहीं ॥

सर्वानन्द वचन

कहे सर्वानन्द सुनहु सुजाना । देव पितर मम स्वर्ग अस्थाना ॥

कबीर वचन

कहैं कबीर जल ठामहिं रहई । कहहु पितरधौं केहि विधि लहई ॥ कीधौं जलहिं रहै तव पुरखा । पेढ़हु वेद यह लखेउ न सुरखा ॥ वेद शास्त्र नहिं करहु विचार । हरिके कचन आहिं जग सारा ॥ पित्ररूप जनार्दन भाखा । जनार्दन आप सन्तन्हमहँ राखा ॥