भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ३१ )

भरत गये जहाँ जननी ताता । विद्या पढ़ै बहुत हरपाता ॥ अवध नरेश मता अस ठाना । रामहिं राज देहु मन माना ॥ सब मिलि ऐसा मत उपराजा । करब बिहान राम कहै राजा ॥ यह चरित्र जब देख भवानी । समझी निराकार की वानी ॥

साखी-सूठ मनुष्य न बूझै, राम लीन्ह अवतार ॥ मारे दैत्य संघारे, लंका के सरदार ॥

चौपाई

सवा लक्ष जीव प्रतिदिन खाई । कौतुक राज बनावत राई ॥ अंबिका गई कैकेई पास । हे रानी तुव पति मति नाशा ॥ रामहिं काल देत हैं राजू । निश्चय है हैं तोर अकाजू ॥ जो वर दियो नृपति तोहि काहीं । सो तुम मांगो आजुहि माहीं ॥ भरतहिं राज राम बनो बासा । माँगहु आज जो होइ हुलासा ॥ गयी कैकेई मांगा बर सोई । राम बिछोह प्राण नृप खोई ॥ त्यागो प्राण अवध नृप जबहीं । सरवन बैर जन्म लियो तवहीं ॥ चले राम लक्ष्मण सिय साथ । करहिं शोक धुनहीं बहु माथा ॥ रामहिं संग दूर लग जाई । फिरहु राम तुम तात दुहाई ॥ सुमंत मंत्री अस वचन सुनाये । पठये दूत तव भरत बुलाये ॥ जाइ बुलावहु भरतहिं आजू । उन कहैं देहु अवध कर राजू ॥ आज्ञा भयी फिरयो सब लोग । सब कहैं भयो राम कर शोगा ॥

साखी-भरतहिं पठे संदेश पुनि, तबहि भयो रवि सांझ ॥ गये जहां तहां रघुपति, बैठ गये वनमांझ ॥

चौपाई

राम लखन बैठे सिया लाई । फिरहु भरत तुम तात दुहाई ॥ फिरहु भरत प्रभु आयसु होई । प्रजा लोक संग सब कोई ॥