भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 492

(४८)

ज्ञानप्रकाश

छन्द-तन अस्थि माँस रुधिर त्वचा सर्व में सुनु एक है ॥ प्रकृति तत्त्व त्रिगुण सबै यह कौन भेद विधेक है ॥ सो ब्रह्म विप्र सर्वमयी सर्वमयी सुनु एक जो ॥ पठि शास्तर निगम पुराण बहु भरम कहा मंडेक जो ॥ दोहा-कर्म अशुचि जेहि देखिये, सो अस करै विचार ॥ सन्त सों दुचिताइ किये, कहैं कबीर पुकार ॥ सोरठा-मन महाँ रहेउ लजाय, सर्वांनन्द अनीति लखि ॥ मम पदशीश नवाय, कहैं धन्य तुम्ह धन्य हो ॥

चौपाई

जब प्रसाद कै कीन्ह अरम्भा । तब जमि बालकको देत है थम्भा ॥ हमहिं कहसि गवनहँ प्रभुगेहा । करब प्रसाद पोषन निज देहा ॥ तासु हृदय बुधिलखि हमपाये । ताते वेगि भवन चलि आये ॥ तब उन अशुचकर्मयक कीन्हा । धर्मदास तुम सुनो प्रवीना ॥ अजा एक पुनि गुप्त मँगायो । गुप्तहि ताकर गला कटायो ॥ निज सेवकन सोकहि समुझावै । अजगा सुधि कबीर नहि पावै ॥ गुप्त रसोई मासु रँधायेसि । बहुविधि अन्तरपाट दिआयेसि ॥ तब चौका पर बैठे जबहीं । हाड़ एक कर लीन्हेसि तबहीं ॥ तेहि क्षण हमहूँ पहुँचे जायी । मोहिं देखत रहु शीश नवायी ॥

कबीर वचन

तब हम कहो सुनो द्विजराई । हमते अन्तर पाट दिवाई ॥ गुप्त अकर्म करै नर कोइ । प्रभु ते नाहि छिपै पुनि सोई ॥ जगकर्ता तुम सङ्गहि देखै । नाहि न लखै नर वह सब पेखै ॥ पाप पुण्य नहि छिपै छिपाये । केतिक जो नर राखु दुराये ॥ नरनारी जिमिलहसुन खायी । गुप्त खाहिं वह पुनि प्रकटायी ॥ तुम्ह अस श्रुतिधारी सज्जानी । सो नहिं जलहु पाठ पहिचानी ॥ हाथ हाड़ मुख थारि हि हाडा । स्वान स्वाँग बन्यो अतिगाढा ॥