भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(६१)

काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥ सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥ धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥ बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥ बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥

रहनी वर्णन

अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥ दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥ हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥ ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥ सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥

सत्गुरु वचन

मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥ तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥ आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥ तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥ कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥ मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥ कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥ सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥ सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥ सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥ को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥