भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(६५)

पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥ नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥ पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥ चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥ साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥ श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥ सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥ नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥ सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥ रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥ सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥ निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥ इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥ सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥ पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥ सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥ छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥ यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥ सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥ तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥ दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥ दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥ सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥ कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥ इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥

इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥

नं. ४ कबीरसागर - ३

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