भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

ज्ञानसागर

( ४१ )

मारहिं कपि कहैं कौतुक जानी । तब हनुमान आप बल ठानी ॥ जारि नगर तब कीन्हों छारा । नगर लोग सब कहैं विकारा ॥ साखी-आय कहौं रघुपति सौं, समाचार हनु वीर ॥ सिंधु बांधि हरि उत्तरे, दैत्य वधन रनधीर ॥

चौपाई

आए कीन्ह दैत्य संग्रामा । मारे दैत्य बहुत तब रामा ॥ कुंभकरण निद्रा सौं जागा । रघुवर सौं युद्ध करे अचुरागा ॥ कहै विभीषण सुन नृप रावन । आए राम जो असुर सतावन ॥ सिया संग लै जाहु तुरंता । क्षमा अपराध गहु पग हर्षता ॥ मारी लात विभीषण भाई । कोधित मिलो राम कहैं आई ॥ समाधान नृपति बड कीन्हौं । लंका बकसि ताहिं कौ दीन्हौं ॥ कुंभकरण गहि समर अपारा । ताको हरि बहु बल सौं मारा ॥ इंद्र जीत तब लाग गुहारी । कर अश्वमेध तपस्या भारी ॥ तिन कपि रोके कपिदल जुथ्या । विभीषण भेद कहो अज जुथ्या ॥ जौलौं पूर्ण जह ना होई । मारहु राम वध करे सोई ॥ भयो प्रभात राम जब देखा । लक्ष्मण लाग्यो बान विशेषा ॥ साखी-मार सो महाबली, मेघनाद जिहि नाम ॥ सुनत क्रोध रावन कियो, कठिन कीन्ह संग्राम ॥

चौपाई

दैत्य महाबल शक्ति संधाना । जूझे लक्ष्मण भया निदाना ॥ तुम हनुमान लै आवहु मूरी । उत्तर दिशा देश बड़ दूरी ॥ दौनागिर पर्वत कर नाऊ । संजीवन सहित ताहि लै आऊ ॥ संजीवन बास तैं लक्ष्मण जागा । हर्ष भये तब कपिकर भागा ॥ तब रघुवीर घेर गढ लंका । दैत्यनके जी उपजी शंका ॥ तब रावन गहि समर अपारी । बंधुहि व्याकुल है सब झारी ॥