कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
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राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥ लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म को कह्यो प्रभाऊ ॥ आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहैं सब कोई ॥ दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एकदिवस पित्रन को जाना ॥ वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥ बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो वखाना ॥ सप्त मनु जबही जाइ विगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥ सप्त इन्द्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई विनाशा ॥
साखी-सप्त ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥
सप्त विष्णु जब वीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥
सोरा रुद्र गति जब हो जाई । तब इक रोम मम परे खसाई ॥
तातैं लोमस नाम है मोरा । करा समाध जीतवै है थोरा ॥
सुन रघुवीर अचंभित भयऊ । ऋषिको वचन प्रतीत न लयऊ ॥
राम चरित्र ऋषी तब जाना । क्या सोंचौ रघुवीर सुजाना ॥
देव अंगुष्ठ भैंटहु जो मोही । तैसे अंगुष्ठ दैऊ मैं तोही ॥
यहै कमंडल मोरे साथा । काढ़ौ गिन जो आवहि हाथा ॥
क्रोधित हाथ डार भगवाना । गिनि उनचास कोट परवाना ॥
परचो पाय रघुवीर न जाना । लोमश वचन सत् कर माना ॥
एतिक सुदरी गिनी विशेषा । कमंडलको कहैं कहिये लेखा ॥
इतने राम रावन होय गएऊ । सुनि रघुवीर अचंभौ भएऊ ॥
साखी-जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥
निराकार निरञ्जन, तासु मर्म नहि जान ॥
चौपाई
त्याग्यो राजपाट बन्धु चारी । गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥
आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
नं. १ कबीरसागर-