भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(१०९)

साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥ गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥

चौपाई

करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥ कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥ मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥ राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥ जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥ खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥ लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥ फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥ परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥ ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥

साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥ मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥

कबीर वचन-चौपाई

तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥ होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥ अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥ वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥ सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥ हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥

राजा बीरसिंह

राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥ अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥

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