भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(११२)

बीरसिंह बोध

युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥ चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥ राजा परे चरणतर आयी ।

राजा बीरसिंह वचन

। दयावंत भल कोक दिखायी ॥

कबीर वचन

देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥ पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥ राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥ बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥ छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥ दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥ अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥ राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥ जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥

कबीर वचन

तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥ चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥ नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥