कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(११५)
सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥ फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥ हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥ तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥
साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥ दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥
चौपाई
धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥ तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥ युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥ प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥ तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥ पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥ जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥ नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥
साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥ तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥
राजा बीरसिंह बचन-चौपाई
साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥ औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥ दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥ महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥ ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥ भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥