कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ७ )
सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥
साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥
जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥
चौपाई
करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥
राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥
कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥
कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥
जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥
मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥
तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥
ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥
साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥
तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥
चौपाई
सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥
विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥
आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥
एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥
तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥
कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥
बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥
साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥
कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥