कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १३ )
देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥ बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥ सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥ पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥ कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥ राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥ अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥
सुकृत बचन
सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥ जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥ तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥
राजा भोपाल बचन
विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥ ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥ छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥ हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥ चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥ दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥
सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥ आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥
बचन-चौपाई
एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥ भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥ दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥