भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( २७ )

नाना

अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥ उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥

भुआ

बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥ मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥

मौसी

मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥ मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥

अडोसी पडोसी

बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥ बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥

दूसरी पडोसिन

दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥ सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥

तीसरी पडोसिन

तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥ कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥

चौथी पडोसिन

चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥ चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥

पांचवी पडोसिन

याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥ घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥

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