भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ३२ )

जगजीवनबोध

मता विषय रस कछू न सूझे । भैरों भूत शीतला पूजै ॥ भूलै कौल गरभकी बांधी । अब चकचौंध आई आंधी ॥ सबही जीव कौलकरि आवै । बाहर निकसि सब बिसरावै ॥

सतगुरुके आगमन

ऐसे जीव भूल रहे सारे । तब सतगुरु आइ पगु धारे ॥ जीव चितावन सतगुरु आये । अलीदास धोबी समझाये ॥ और हंस बहुत चेताये । फिरत फिरत पाटनपुर आये ॥

सतगुरुका पाटनपुरमें पहुँचना

सतगुरु आये पाटन ठाऊँ । जगजीवन राय बसै तेहि गाऊँ ॥ राय न मानै भक्ति विचारा । हँसे भक्तको बारम्बारा ॥ भक्त रूप सब शहर निहारा । कोउ न मानै कहा हमारा ॥ तब आपन मन कीन विचारा । कैसे मानै शब्द हमारा ॥ जाइ बाग में आसन कीन्हा । गुप्त रहे काहू नहिँ चीन्हा ॥ द्रादश वर्ष भये बाग सुखाने । सुलगे काछ होय पुराने ॥ चार कोस तेहि बाग लम्बाई । तीन कोसकी है चकलाई ॥ तहाँ जाय आसन हम कीन्हा । रहौं गुप्त काहू नहिँ चीन्हा ॥ तहवाँ मैं कौतुक अस कीया । सूखे बाग हरा कर दीया ॥ विकसे पुढुप जीव सब जागे । सबने हरियर देखा बागे ॥ माली जाय कै दीन बधाई । जागा भाग तुम्हारा भाई ॥ देखा बाग जाय तेहि वारा । फल फूलनका अन्त न पारा ॥ हर्षा माली बाहर आया । देखा बाग बहुत सुख पाया ॥ फूलन छाब भरी दुइ चारी । नाना विधिके फूल अपारी ॥ नाना विधिके मेवा लाया । ले माली दरबारि आया ॥ बैठा राजा सभा मैझारा । उमरावनको तहाँ न पारा ॥ माली सब ले धरी रसाला । राजा पूछ करे ततकाला ॥