भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ३५ )

मित्र समझता है उनमें से कौन तेरा उस समय सहायक होगा ? कौन तुझको नरकसे बचावेगा ? गर्भमें मैंने तुझको बहुत सम- झाया था सो हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया मैंने सबसे घर घर पुकार कर कहा मेरा कहना किसी मूर्खने न माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला ।

राजा बचन-चौपाई

अब तो गुरु होहु सहाई । मोकों यमसे लेहु छुड़ाई ॥ सबही करम बरुसकै दीजे । हूबत मोहि उबारके लीजे ॥ सैन करी पालकी मँगाई । लै सद्गुरु को माहिं बिठाई ॥ पाँव उधार काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥ सद्गुरु पग धर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥ समरथ दर्शन दीन्हा आनी । धनधन भाग्य तुम्हारो रानी ॥ सद्गुरु को पलँगा बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥ राजा भाखे शीश नवाई । मोकों राखो गुरु शरनाई ॥ करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥ अब हम शरना लेब तुम्हारी । दया करो तन दुखत हमारी ॥

सतगुरु बचन

तब कहे सतगुरु लेहु सँभारी । राजा सुनहु बात हमारी ॥ कस चले राजा लोक हमारे । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारे ॥ कोटिन ज्ञान कथे असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥ जो कोई बूझे भक्ति हमारी । ताको चहिये लगन सँचारी ॥ जैसे लगन चकोरकी होई । चन्द्र सनेह अँगार चुगोई ॥ ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पग धर सोई ॥ तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥ कैसे छोड़िहौ मान बड़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥ कैसे छोड़िहौ हाथी असवारा । कैसे छोड़िहौ अंथ भँडारा ॥

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