भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ५५ )

चारेउ पांडव काल बड़ा भयेऊ । रायशुधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥ ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा । नाम विना देखो अस चीन्हा ॥ देखत कृष्ण अपन तन त्यागा । चिता तासु की रचन जो लागा ॥ चन्दन काष्ठ तासु तन जारा । चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥ इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ । तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥ सुंधायो द्वार काहु नहि जाना । ठक २ उठै दिन रात प्रवीना ॥ शिशुपाल भुजा चार रहो जाही । मारचो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥

साखी-सबै अंग सम्पूर्ण हैं, जगन्नाथ को भाव ॥

शिशुपाल की भुजा उखारी, ताको वैर दिवाव ॥

चौपाई

दोह भुजा काष्ठ जेहि उरेहा । वैर न छूटे सो गहि देहा ॥ जो काइ जीव जोर कर मारा । तासु जन्म किमिहो निस्तारा ॥ राम कृष्ण तैं को बड़ आही । वैर घात तासों न रहाही ॥ कृषी करै किसान जस भाऊ । ऐसी दसों जनम निर्माऊ ॥ दसों जनम ऐसे ही बीते । तासों कहै कि सुक्ति करीते ॥ बूझो नहि चरित्र भगवाना । तीन जुग गये काल नियराना ॥ है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा । तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥ आप स्वार्थी तिनहु मारे । ज्यों नकटी विश्वासहि वारे ॥

साखी-जिस सिरदार मही को, करै चरित्र भुवार ॥

जहैं तहैं शील पटावै, मछ बली तब धार ॥

चौपाई

कलियुग अन्त मलेच्छ व्यवहारा । तब हरि निष्कलंक अवतारा ॥ मारहि मलेच्छ सबै पुर कैसे । पावक मध्य तृण है जैसे ॥ पावक रूपनि कलंक अवतारा । तृण समान मलेच्छ संहारा ॥ बहुर कलंकी ज्योति समाई । कौतुक करै निरंजन राई ॥ ऐसे दसों जन्म निर्माये । निरंकार पुनि ताहि सताये ॥