भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बाधसागर

( ७१ )

गरुड वचन

तबही गरुड कह्यो अर्थाई । अस्तुति कीन्ह बहुत लौ लाई॥ एको बात गोंय नहीं राखी । कृष्ण बहुत कै अस्तुति भाखी॥ निर्गुण के हम गम्य न जाना । बहुत भाँति उन गम्य बखाना॥ उनतो निर्गुण गम्य बतावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा॥ औ हम उन कहँदल जो दीन्ह। उन आवे की आज्ञा कीन्ह। ॥

सत्गुरु वचन

तब हम उनको भेद बतावा । एकोत्तर से नरियर फरमावा ॥ बहुत जतन कै मंडप छावा । बहु अतुरागी साज सजावा ॥ जेतके साधु द्वारका आया । सबको गरुड कानि बुलवाया ॥ जेतिक साधू तहाँ रहाये । गरुड सबहिंको दल पहुँचाये ॥ जहाँ ले सुनि हैं सहस अठासी । नाग लोकके नाग जो वासी ॥ वासुकि देव जो आपु रहाये । औरो नाग बहुत चलि आये ॥ आय विष्णु ब्रह्मा दोउ भाई । शीव आय बहु तेज जनाई ॥ सब पर तेज महादेव कीन्ह। तुम सब मिलिके गरुडहि चीन्ह। ॥ तबहि गरुड पूछा सहिदानी । जोई कृष्ण कहा मोहि बानी ॥

गरुड वचन

सुनहु ब्रह्मा विष्णु मदेशा । यह मुहि कृष्ण कहा उपदेशा ॥ एति समय बीति जब जायी । तब हम तुमसों कहब बुझायी ॥ जोइ कृष्ण सब कहा विवेकी । सो तुम्हरी मति आँखिन देखी ॥

महादेव वचन

यह सुनि महादेव रिसियाने । हमरी गति तुम काहु न जाने ॥ हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमहीं छोड़ि अवर चित लाई ॥ तुम हैं पंछी मतिके हीना । हमहिंछोड़ि औरहिं चित दीना ॥