भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ७५ )

बैठे जाय पुनि गरुड समाजा । उठि तब चर्चा निर्गुण साजा॥ ब्रह्मा कह तुम कैसे आये । सो मोहि वचन कहो समुझाये॥ कौन काज यहाँ पगु धारा । कहे ब्रह्मा तुम कृष्णके प्यारा॥

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । तुमहिं चितावन आयउँ भाई ॥ तुमहिं चितावन हौं पगुधारा । आदि पुरुष वह रहै नियारा ॥

साखी-विनु देखे को जाय यह, नहिं पावे कोइ ठाम ।

जन्म अनेक भरमत फिरे, मरे विनु गुरुके नाम ॥

आदि पुरुष आगम है, जाको सकल प्रकाश ।

निर्गुण भेद अपार है, तुम कहैं बांधी आश ॥

चौपाई

कोटिन ब्रह्मा गये सिरायी । अविगतकी गति काहु न पायी॥

कोटिन ब्रह्मा पृथ्वी विलाने । अविगतकी गति काहु न जाने॥

कोटिन विष्णू गये सिरायी । फिरि फिरिकै पृथ्वीहु विलायी॥

कोटिन रुद्र देह धरि लीना । अस्थिर होय जगत्सो कीन्हा॥

कोटिन इन्द्र अवतार जोलीन्हा । अविगति पुरुष काहु नहिं चीन्हा॥

गण गंधर्व नर कौन चलावै । सनक सनन्दन पार न पावै ॥

शेष नाग बहु भांति भुलाने । आदिपुरुषकी खबरि न जाने॥

सब परिवार जो भूले भाई । अवगति की गति काहु न पाई॥

भुला देखि जिव दथा न आई । जीव अनेक घात किहु भाई ॥

सब भूले कोइ लागु न तीरा । महा अधम सो आहि शरीरा॥

देह धरी सब भरमें आई । आपन आप सब करै बडाई ॥

अहमेव कैसे खोजेहु जाई । मांताको कहा न कीनेहु भाई ॥

१ जिन २ पुस्तकों में सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका वर्णन आया है, उन सबोंमें आद्याकी आत्माको न मान कर हठ करके ब्रह्माका निरंजन के खोजमें जानेका वर्णन आया है वहासे जानना चाहिये और यथार्थ भेद गुस्ते ।

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