भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ७८ )

गरुडबोध

सुनते विष्णु विमान चढ़ाये । चढ़ि विमान ब्रह्म लोकहि आये॥ विष्णुपुरीसे विष्णु जब आये । बैठे जाय ब्रह्माके ठाये ॥

विष्णु वचन

केहि काज पर मोहि बुलायी । सो मोहि भेद कहो समझायी ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा वचन कहै अर्थावै । कहै गरुड हम केहि चेतावै ॥ हमको मनुष्य देह करि जाने । आदि पुरुष औरै को माने ॥ भले विष्णु तुम आये भाई । अब शिवको तुम लेहु बुलाई ॥ गढ कैलास शिवका अस्थाना । तहाँको अब तुम जाहु विमाना ॥ सब देवनको आनु बुलायी । सुनहीं चर्चा गरुड की आयी ॥ महा विमान तुरत चलि गयऊ । गढ कैलास पर ठाढे भयऊ ॥ शिवशंकर को माथ नवायी । पाछे ब्रह्माका वचन सुनायी ॥ ब्रह्मा गरुड जहाँ झगर पसारा । तेहि कारण तुम सबके हँकारा ॥ ब्रह्मा विष्णु बैठे एक ठाई । कीन्ही चर्चा मंड मँडाई ॥ गरुड सबहि का करै उच्छेदा । सो मैं तुमहि बतायो भेदा ॥ बाजे डमरू हने निशाना । चले रुद्र तब साजि विमाना ॥ तुरत चले नहीं लाये बारी । चले रुद्र आये पगुथारी ॥ ब्रह्माको जहाँ भयउ उच्छेदा । बैठे जहाँ करे बहु भेदा ॥ इन्द्र लोक सो इन्द्र बुलाये । जेहि सँग देव सबै चलि आये ॥ सो सब चलि ब्रह्मा पहुँ आये । वासुकि देव जो आप रहाये ॥ आवत उनके नाग बहु आये । बहुते नागिन आयी बहुभाये ॥ सुर नर मुनि सब आनिबुलायी । जो जस आसन तस बैठई ॥ ब्रह्मा विष्णु बैठे यक ठावा । गरुड तहाँ पुनि ज्ञान सुनावा ॥

गरुड वचन

अविगतिकी गतिआहि निनारा । सब भूले कोइ पाउ न पारा ॥