कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबाधसागर
( १३ )
सत्गुरु वचन
तब तो ब्रह्मा ध्यान लगावा । तुरतहि गये ब्रह्मके ठावा ॥ ब्रह्मा वचन तब उठा परमाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥ तुम ब्रह्मा गर्व बहु भाखा । ताते जोति छिपाय के राखा ॥ माता ते नहिं अन्तर करते । फिरि फिरि देह सु काहे धरते ॥ ब्रह्मा तवै रहे अरथाई । सन्मुख बात कही नहीं जाई ॥
गरुड वचन
तीनों देव विवस जब भयऊ । देखि गरुड तब बोलन लयऊ ॥ अब जनि भूलो तीनों देवा । आदि पुरुषकी करो तुम सेवा ॥
सत्गुरु वचन
तीनों देव मिलि मंत्र यक कीना । बालक को विदा कै दीना ॥
तीनों देव वचन
सुनु बालक तेरी मृत्यु तुलायी । कौनी शांति कै तोहि जियायी ॥ तुमते कहैं हम वचन प्रकासा । हम जो गये ज्योतिके पास ॥ ज्योतिस्वरूप हम कहा बुझायी । अब तुम बरजहु काल बनायी ॥ तबही ज्योति वचन अस भाखी । यहि बालकको अबको राखी ॥ अवधि तोहार नियरिहोय आयी । अब कोइ राखे राखि न जायी ॥ साखी-हम तीनों को धिग है, जीवन धृग हमार । हमसे बालक ना जिये, मिथ्या कीन्ह हँकार ॥ बालक तो जीवै नहीं, मिथ्या जन्म हमार । यह चरित्र ना जानिया, केहि करें उपचार ॥
गरुड वचन-चौपाई
जो धिरकार तुम कीन पुकारा । अपने मनमें करहु विचारा ॥ गर्व अभिमान छोड़ु सब भारा । मन अपने तुम मन्मदु हारा ॥ वो तो पुरुष गर्व नहिं भाखे । तुम यम काल अपने शिरराखे ॥