कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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गुरुडबोध
हो जावेंगे । और स्वयम् कबीर साहिबमें ऐसे २ अनर्थका दोष लग सकेगा कि, जिस कलंकको मिटाना कठिन ही नहीं बरन् असम्भव है । इतना ही नहीं ग्रन्थोंमें बात बातमें आध्यात्मिक अर्थ भी बतलाया गया है और जिस ग्रंथकी जैसी प्रक्रिया चली है वैसेही उसका निर्वाह भी किया गया है जो लोग मनन और विचार किये विना केवल शब्दों और पदोंको लेकर लड़ते झगड़ते हैं उन्हें कबीर साहिबके इस मसले पर ध्यान देना चाहिये कि—“कबीरका गाया गावेगा । तीन लोकमें धक्का खावेगा ॥ कबीरका गाया बूझेगा । तीन लोक वहि सूझेगा”—जैसे इसी ग्रन्थमें यदि गुरुडका वही साधारण अर्थ लिया जावे जैसा सर्वसाधारण समझते हैं, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि विष्णु उपासकोंके समक्ष इस पुस्तकको बाँचनेवाला मार खाये विना नहीं रहेगा—किन्तु जब उसी का आध्यात्मिक अर्थ समझेगा और दूसरोंको समझावेगा कि, गुरुड नाम है जीवका, विष्णु नाम है सतोगुणका अर्थात् सतोगुणभावों करके सम्पन्न जो मुमुक्षु है उसको जब ज्ञानी गुरु मिलता है तब उसे त्रिगुण ( रजोगुण ) ( ब्रह्मा ) सतोगुण ( विष्णु ) तमोगुण ( शंकर ) के जाल से निकाल कर त्रिगुणातीत कर देता है—अर्थात् सतपुरुष रूप उसके प्रत्येक आत्माके स्वरूपका ज्ञान करा देता है । तब गुरुड रूप मुमुक्षु तीनों गुणोंको जीत कर शरीर निर्वाह अथवा प्रारब्ध बलसे यावज्जीवन सतोगुणके दिव्य गुणोंको सम्मुख रख कर आनन्दपूर्वक विचरता और दूसरोंको भी अधिकार पूर्वक उपदेश देकर सत्यपदकी पारख बतलाता है । इसी प्रकारसे कबीर पंथके सर्व ग्रन्थोंका आशय आध्यात्मिक है ।
जो इन ग्रंथोंको पढ़कर अपने आत्माके कल्याणार्थ सत्य अर्थको ग्रहण न करके केवल शारीरिक सुख और