भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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श्रीमुनीन्दाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

सप्तमस्तरंगः

ग्रन्थ हनुमानबोध

अजर ज्ञान करणा यतन, सत्य कबीर जगत्तार । तामु चरण बन्दन किये, होवे जगत उधार ।

धर्मदास बचन—चौपाई

धरम दास विनवे करजोरी । तुम समरथ हौ बन्दी छोरी ॥ युगन युगन में तुम चलि आये । आदिअंत की खबर लगाये ॥ एक अनुराग मोरे मन आया । सो प्रभु कटु करि मो पे दाय।॥ हनुमतको कब मिल्यो गुसाई । सो प्रभु मोहि कहिये ससुझाई॥

१ ह इति प्रसिद्धे नु इति वितर्के इस व्युत्पत्तिसे जो मान्य के योग्य होवे, अथवा—“मैं माया तत्कार्य नहीं और वह मेरा नहीं किन्तु मैं तिसका ब्रह्मा हूँ” इस निरव्ययवानका नाम हनुमान है । सो मन इन्द्रियादिक जट परायोंकी अपेक्षा प्रत्येक आत्माही (बैतन्य होनेसे) मान्य करने योग्य है । इससे प्रत्येक आत्माको ही हनुमान कहते हैं, अथवा—

अनादि पक्षके वट वस्तुओंमें जीव ईश्वर दोनों भाई हैं । उनमें राम ईश्वर हैं और लक्ष्मण जीव रूप मुमुक्षु हैं । मानरूप इन्द्रदेवको जीतनेवाला गुप्त ही इन्द्रजीत है । सो गुरुरूप इन्द्रजीतके ज्ञानरूप शक्ति के भारने से मुमुक्षु रूप को मूर्च्छा हुई अर्थात्—आचरण विशिष्ट अज्ञानाशक्त नासाही मूर्च्छा है, तब विशेष विशिष्ट अज्ञानाशक्त रूपमानने शरीररूप पर्यंतसे प्रारम्भ रूप संजीवन बूटी साकर मुमुक्षुरूप लक्ष्मण की मूर्च्छा छुड़ायी अर्थात् निज स्वरूपसे भिन्न सर्व नाम रूप जगत् निष्प्राप्तका नाव निरव्ययरूप बोधिक होना अर्थात् संसारकी प्रतीतिपूर्वक जो जीव मुक्ति सोई मूर्च्छा—