कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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हनुमान बवन-चौपाई
सुनो सुनीन्द्र वचन हमारा । हम नहिं जानै भेद तुम्हारा ॥ कहौ प्रतीति कौन विधि आवै । कैसेके यह मन पतियावै ॥ यह प्रतीति कौनो विधि आयी । तब हम जानि करब सेवकारी ॥ जहँ समरथ तहाँ हम जावै । तबही हमरा मन पतियावै ॥ उहाँ जाइ इहाँ फिरि आऊँ । तब मैं मन परतीति लगाऊँ ॥ जो तुम सत्य सत्य कहि भाखी । तो मोको दिखलाओ आँखी ॥ करौ प्रतीति गहौं तुव शरणा । बारम्बार बंदौ तुव चरणा ॥ जो गहि तुम दिखावो मोको । तबही झूठ न जानौं तोको ॥
साखी-सुनो सुनीन्द्र मोरि गति, बिन देखे नहिं पति आवैं ॥ आदि सृष्टिकी तुम कहत हो, तहाँ कौन विधि जावैं ॥
मुनीन्द्र बवन-चौपाई
जब ऐसो कह्यो हनुमाना । उठे मुनीन्द्र मनमाहीं जाना ॥ उठते देखा फिरि नहिं देखा । देह विदेह भये अवरेखा ॥ पवन रूप होइ गये अकासा । बैठे पुरुष विदेही पास ॥ चहुँदिशि देखे हनुमत वीरा । कौन सूरतिको भयो शरीरा ॥ गैल महिं चले पगधारी । परम प्राण तहाँ लगी खुमारी ॥ देखत चन्द्र वरण उजियारा । अमृत फलका करे अहारा ॥ असंख्य भानु पुरुष उजियारा । कोटिन भानु रोम छबि भारा ॥ देखा चारों दिशा सब झारी । पता न पाय रहे जब हारी ॥ तब हनुमत हाकँ तहाँ मारी । तुम मुनीन्द्र अहौ सुखकारी ॥ अब प्रगट होइके दर्शन दीजे । तुम्हरी विरह मम हिरदय भीजे ॥
साखी-भये विदेही देहधरि, आये हनुमत पास । और वरन अरु भेषही, सत्य पुरुष परकाश ॥