कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३२ )
हनुमानबोध
अक्षर सो निःअक्षर है न्यारा । ओम ओंकार ताहि आधार ॥ तीनों गुणका जो विस्तारा । रंकार है सबके पारा ॥ ताके दरे निःअक्षर धारा । सोई भेद निज आहि हमारा ॥ ये सब हैं समरथ आधार । समरथ शक्तिको वार न पारा ॥ ताकी आशा करे जो कोई । उतरे पार भौसागर सोई ॥
हनुमत कहे साहिब सुनो, तुम हौ दीन दयाल ॥ तुम समान रघुपति नहीं, काटयो यमको जाल ॥
कबीर वचन-चौपाई
कहे कवीर सुनो धर्मदासा । वही ज्ञान मैं तुम्हें प्रकाशा ॥ हनुमत अंश पुरुष का होई । तब हम उनको मिलिया सोई ॥ हनुमत बोधि चले हम जबहीं । चतुर्भुजके ढिग पहुँचे तबहीं ॥ उनसे कीना ज्ञान विचारा । वह हंसनका है सरदारा ॥ चतुर्भुजको हम दियो गुरु आई । ताहि बनायो दर्भगा राई ॥ जो कोइ तुम्हारा वीरा पावे । सो हंसा सतलोक सिधावे ॥ इतनी कहिके हम काशी आये । चलत चलत कछुवार नहीं लाये ॥ काशी विद्या गुरु बहुतोई । पण्डित ज्ञानी बहुते होई ॥ धर्मदास तुम वंश हमारा । तुम्हरे काज हम यहां पगुधारा ॥ तुम्हरे हाथ पान जो पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥
साखी-कहे कवीर धर्मदास सों, हनुमत बोध्यो जाय । पान परावना देइके, तुमको मिलिया आय ॥ धर्मदास वन्दन करे, धनधन हो सत्यकवीर । हनुमतको दर्शन दियो, धन है हनुमत बीर ॥ छन्द-धन्य साहिब धन्य हौ तुम दर्शन दीनो । कीजे दया अब दासपै जाऊँ चरण लागु धाइके ॥