भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १४७ )

सत्यकबीर वचन

तबहि कबीर कहे समुझायी । तुम समुद्र कस वरण छिपायी॥

समुद्र वचन

तब समुद्र अस वचन सुनाई । कहा है नाम तुम्हारो भाई ॥

सत्यकबीर वचन

हम तो अंश पुरुष सरदारा । भक्त कबीर है नाम हमारा ॥

समुद्र वचन

तब समुद्र बोले ऐसी बानी । हमतो हार तुमहिं से मानी ॥ हमरो मंथन जब इन कीया । बड़दुख तब इन हमको दीया ॥ और त्रेतामें पैज बँधाई । तबका वैर हमको साले भाई ॥ तुम तो हो सतगुरु होड़ु सहाई । तुमते हमार कछू न बसाई ॥

सत्यकबीर वचन

तब समुद्र को हम समझायी । निर्धनको चोर कहा लै जायी ॥ सब जग साख तुम्हारी देई । तुम दाता हम भिक्षुक होई ॥ इतनी दया तुम हमपर कीजो । बोली करी कथा सुनि लीजो ॥ इनको टहल शीश जो दीना । तापर दुष्ट दगा जो कीना ॥ त्रिया हरण इनकी जो भयऊ । जब इन बनहि बसेरा लियऊ ॥ राम लक्ष्मण हनुमान मिलायी । तब तिन मति असकीन बनायी ॥ सागर बाँधनका मता जो कीना । मच्छरूप तुमही धरि लीना ॥ तब तुम ला उनके ठगिरहेऊ । करि विश्वास बहुतै दुख सहेऊ ॥ यह अपने मन गरब झुलाना । हमरे नाम सो शिला तराना ॥ राम नाम जब अंक चढावा । धरे पैर जब लीन चुवावा ॥ खत राम तब चकित भयऊ । तबही शीश धूनि कर रहे ऊ ॥ अतिही शोच करे बल वीरा । शीश डुलावे सागर तीरा ॥ जलमें जंतु देख्यो बड़ भारी । यह तो झूठी पैज हमारी ॥