कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(१२)
मुहम्मद बोध
धर्मरायते झगर पसारा । निरंजन बांधि रसातल डारा ॥ वेद कतेबको अमल मिटावों । घर घर सार शब्द फैलावों ॥ समर्थ हुकम चले सब माही । व्यापै सत्य असत्य उठिजाही ॥
मुहम्मद वचन
पीर मुहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहीं जानी ॥ सुनाकान नहीं आखिन देखा । बिन देखे को करे विवेखा ॥ जो नहीं देखो अपने नैना । कैसे मानो गुरुको वैना ॥ जो तुम खुद अहदी है आये । हुकम हजूर फरमानले आये ॥ जौन राहसे तुम चलिआवो । सोई राह मोकहैं बतलावो ॥ हँसनको अस्थान चिन्हावो । समर्थको मोहिलोक देखावो ॥ साखी-हँसनको अस्थान लखि, तब मानो परमान् ॥
जो समर्थको हुकम है, सो मेरे परवान् ॥
कबीर वचन
सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । साहेब तुमको देऊँ बताई ॥ चले सैल को दोनो पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥
मोकाम १
भूमिते छत्तिस सहस ऊँचाई । मानसरोवर तहाँ कहाई ॥ तहाँ नासूत आहि मोकामा । नबी कबीर पहुँच तेहि धामा ॥ तहाँ दाऊद पर्यंवर होई । जम्बूर किताब पठे तहाँ सोई ॥ तहाँ सलामालेक सोई कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥
मोकाम
तहवाँते पुनि कीन पयाना । चौविस सहस वैकुंठ प्रमाना ॥ तहवाँ पहुँच बैठे ऋषि बासा । देव सबै बैठे तेहि पास ॥ वह वैकुंठ विष्णु अस्थाना । मलकूत मोकाम मूसाको जाना ॥ मूसा पैगम्बर पढ़ै किताबा । उसका नाम तौरैत किताबा ॥ सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥