भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ४१ )

सुलतान वचन

जाओ विहिश्त मानो विश्वासा । सहस्र सुई लेना हम पास॥

सतगुरु वचन

इतनी गोष्ठि शाह सो कीना । तब तहाँ से पयाना दीना ॥ एक सुई उन हम सो लीना । सहस्र सुईका कौल तब दीना ॥ साखी-इतना कहि हम उठि चले, चानक शाह लगाय ।

नीमशाम के वक्त में, जुड़ी अदालत आय ॥

चौपाई

सब मिलि आय जुडे दरिखाना । बैठे आय तहाँ सुलताना ॥ शाह के हाथ सुई जब देखा । तब वजीर मन कीन विवेखा ॥ हाथ जोड़िके विनती लावा । कैसे सुई हाथ में आवा ॥

वजीर वचन

कैसे सुई हाथमें लीना । कारन कौन कहो हम चीना ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो दीवानाँ । बन्दा अल्लाह दिया सहिदाना॥ दुरवेश एक यहाँ चलि आया । जिन या सुई दीन हम पाया ॥ कहा दुरवेश विहिश्त तुम आव । तब या सुई लेब तेहि ठाँव ॥ ऐसे वचन कह्यो दुर्वेशा। सुई हम देन कही तेहि देशा ॥ एक सुई हम उनसे लीना । सहस्र सुईका कौल हम दीना ॥ इतना वचन कहे सुलताने । सुनत वचन विन्ती तिन ठाने॥

दीवान वचन

दीवान कहे सुनो हो साई । सुई विहिस्त कौन विधिजाई ॥ गाम परगना और ठकुराई । सबही धरा रहै यहि ठाई ॥ तात मातु सुत सुन्दर दारा । तन धन धाम सकल परिवारा॥

१ दीवान