कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 784, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(४४)
सुलतानबोध
सुलतान वचन
तुम काफिर अछ्हाह ते दूजा । भूत प्रेत चित लाये पूजा ॥ चक्की ढिग इनको बैठाओ । निशि दिन इनसे नाज दराओ ॥ जो नहीं करामात तोहि होई । क्यों कर सिद्ध कहाओ सोई ॥
सतगुरु वचन
बैठे सिद्ध सब चाक चलावें । चित विस्मय सब हरिगुणगावे ॥ त्रास देखि मुनि आयी दाय। ततछिन् शाहद्वार चलि आया ॥ सोटा मारा चक्की माहीं । घूमहु सतगुरु दाय। कराहीं ॥ बिदा सिद्ध भये हम भयगुती । देख्यो आय शाहके जपती ॥ कहा साह सों तिन्ह कर जोरी । चक्की सब आपहिं चलि दौरी ॥
सुलतान वचन
मुनि के शाह कैफदिल आयी । कौन शरूश यह चक्कि चलायी ॥ वेगहि दूँडि लाओ यहि वारा । चक्की चलायो सो अछ्हाह प्यारा ॥
सतगुरु वचन
दूंदत नगर थके दिल जबहीं । नहिं पाये व्याकुल चित तबहीं ॥ जबहि शाह घर लगन विचारा । तब हम जीवदया उर धारा ॥ तुरतहि जाय तहां पगु धारा । शाहके महलन चढे गोहारा ॥ महलपर देखत फिरो वहुँ खुठा । करो पुकार हेरानो ऊंटा ॥ मुनि के शाह कोधकरि धाये । कौन हमारे महलन पर आये ॥ कहो तुम कौन कहाँ से आवा । कौन काज महल पर धावा ॥ तब हम कहा ऊंट यक छूटा । दूंदत फिर्ह मैं अपनो ऊंटा ॥ बहुत अधीन ऊंट हम भायो । खोजत ऊंट महल पर आयो ॥ मुनिके शाह तबे हँसि दीन्हा । कैसे ऊंट महल पर चीन्हा ॥ जँगल माहिं तेहि खोजो जाओ । कैसे ऊंट महल पर आओ ॥ तब हम कहा सुनो तुम ज्ञाना । चढे तरक्त अछ्हाह किन जाना ॥ ऐसी बूझ करो मन माहीं । सत्य वचन धरो मन ठाहीं ॥