भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मुसलमानबोध

❁ सुनि कर शाह अचम्भा भयऊ । ऐसो वचन कबही नहिं कहेऊ ॥ भयो ज्ञान शाह सुनि वानी । काल कला फिर आनि समानी ॥ अरुझे शाह स्वाद सुख पायी । भयो मगन मन अति ललचायी ॥ साखी-सखी सहेली सँग लिये, करत रंग अरु राग ॥ बिसरे ज्ञान विचार सब, मोह बान उर लाग ॥

चौपाई

यक दिन शाह सेजहीं सोया । तोशक झूल विछौना जोया ॥ देह उण्ण छेह अवसर ताही । नींद न आवे बहुत सिसाही ॥ कोई सखि पंखा पवन डुरावे । कोह चन्दन घसि अङ्क लगावे ॥ तबहू नींद न आवे शाहा । बहु व्याकुल अतितन भइ दाहा ॥ एक चरित्र तहाँ हम कीना । साखी रूप धरि दर्शन दीना ॥ सुबुधि सखी जोरे दोह पाना । सुनिये एक अरज सुलताना ॥ कहूँ वचन परमारथ जानो । सुनत कोध दिल जो नहिं आनो ॥ यह तन पाय बहुत सुख कीना । कबहू धनी नहीं दिल दीना ॥ जिन साहिब यह देह बनावा । तख्त सेज सुख राज करावा ॥ कोठा कोट अमीरी भारी । गज औ तुरंग हरष संग नारी ॥ ऐसा साहिब क्यों विसराये । राग रंग चित अति हरषाये ॥ जब वह साहिब कोप कराई । तेहि समय को होय सहाई ॥ साखी-साहिब गीझे जेहि समय, देह विहिश्त को वास ॥ मालिक मेटे पलक में, करइ राज सुख नाश ॥

चौपाई

आखिर देह मिलेगी खाका । साहिब नेह करि होऊ पाका ॥ वचन सुनत चित गहबर भयऊ । आँसू बहुत चक्षु ते गयऊ ॥

१ इस चौपाईसे लेकर आगे जिस चौपाईके अन्तमें इसी प्रकारका फूल दिया है वहाँ तक पुरानी प्रतिबोधि नहीं है ।