कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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मृतकके समान किन्तु बैठी हुयी देखकर उसने डर कर पीछे पाँव जाकर हमको समाचार दिया । जिससे आश्चर्यमें आकर कौतूहल वश हम यहाँ तुम्हें देखनेको आये । यहाँ आकर हमारे हकीम साहिबने तुम्हें देखकर कहा कि तुम मरी नहीं हो किन्तु सकतेकी बीमारीमें अचेत होगयी हो । फिर उन्होंने तुम्हारी दवा करके अच्छा किया है जिससे अब तुम बात चीत करने को समर्थ हुयी हो । इतना कह कर व्यापारीने कहा इसके अतिरिक्त और हम कुछ नहीं जानते अब तुम अपना वृत्तान्त सच्चा सच्चा हमसे वर्णन करो कि, तुम कौन हो ? तुम्हारे माता पिता का नाम ग्राम क्या है ? औ तुम्हारे ऊपर क्या र बीती है ? ॥
कर न्याँ किस गुलिसताँ का गुल है तू ।
पायी है किस बोस्तों में रंग व बू ॥
इधर तो यह बातें होरही थीं उधर तहखानेमें बैठे हुए अद्दम-शाह कबरके पहरदारोंके भ्रमसे भयके मारे डरते हुए बडी सा-वधानी से कान लगाकर बाहरकी बातें सुन रहे थे । जब उन्होंने शाहजादीको बात करते सुन लिया तब उनकी और ही दशा होगई । अब बाहर निकलकर शाहजादीके पास जानेको बार बार वह साहस करने लगे । फिर तो गारके द्वार से उन्होंने मुहँ निकाल कर दोनों आदमियोंको बड़े ध्यानसे देखकर जब निश्चय करलिया कि, वे कबरके पहरदार नहीं हैं तब एकदम बाहर निकल आये । बाहर निकलकर उन्होंने कुटीके बाहर अन्धेरेमें खड़ा होकर शाहजादी और व्यापारीकी बात चीत सुनने लगे । और जब उन आदमियोंके रूप रंग और शारीरिक लक्षणों से यह बात निश्चय होगई कि, वे न तो जामूस हैं न कोई बुरे आदमी हैं तब आनन्दके समुद्रमें गोते खाते हुए एकदम कुटीके भीतर