भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ३६ )

निर्गुण सों जु भया ओंकारा । तासों तीनों गुण विस्तारा ॥ निर्गुण सो मन भये प्रचण्डा । ताको बास सकल ब्रह्मण्डा ॥ ओङ्कार मन आप निरञ्जन । नाना विधिके कीये व्यञ्जन ॥ भौंति भौंतिके घाट सवारा । कहैलंग गिनों वार नहि पारा ॥ ताके अंश सकल अवतारा । राम कृष्ण तामैं सरदारा ॥ पूरण आप निरञ्जन होई । इनके फेर फार नहि कोई ॥ सर्गुण निर्गुणहुकी करे सेवा । भक्ति करे अरु पूजे देवा ॥ कर आचार विचार न जाने । सो मेरे मन कभी न माने ॥ मन बोधे मन माहि समावे । निज पदको कोई नहि पावे ॥ मन को बोध करे जो कोई । मन पहुँचावे पहुँचै सोई ॥ जाप निरञ्जन माहि समाई । आगे गम्य न काहू पाई ॥ ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ॥ ऋषिसुनि गणगन्धर्व रु देवा । सब मिल करें निरञ्जन सेवा ॥ साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ॥ बहुत प्रीति सो भक्ति विचारी । मिलन २ लीला अधिकारी ॥ जाय निरञ्जन सो हो भेटा । काल रूप धर करै समेटा ॥ वही निरञ्जन का विस्तारा । तामैं उरझो सब संसारा ॥ जिधर तिधर राखै बिलमाई । रचना अनन्त अपार बनाई ॥ धर्मदास तुम भक्ति सनेही । इन मैं मत अटकावे देही ॥ जन्म धरे छूटै नहि भाई । ताते आप कहो गुहराई ॥ भक्ति गुप्त जाने नहि कोई । तुर्त सनेही पावै सोई ॥ साखी-इन्ते भक्ती गुप्त है, सुन धर्मदास सुजान । भक्ति करो भरमो नहीं, सोई भक्ति प्रमाण ॥

धर्मदास-वचन चौपाई

हे स्वामी मैं हूँ अज्ञानी । गुप्त भक्ति मोहिं कहो बखानी ॥ तुम यह भक्ति कहाँ सों आनी । सोई बात मोहिं कहो बखानी ॥

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