भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 923, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 923

बोधसागर

( ५५ )

वहांसे तुम्हीं दीन पठवाईं । यहां आय कर लागी कई ॥ काल पुरुष दीन्हा भरमाईं । जिन सब सृष्टि बनाके खाईं ॥ जग जीवनसों तुमहो नियारा । तुम्हरे काज लीन्ह अवतारा ॥ अवर काज मोर कछु नाहीं । हों निरंतर जगके माहीं ॥ मोहिं न व्यापे जगकी माया । कहन सुननकी है यह काया ॥ देह नहीं अरु दरशै देही । रहो सदा जहां पुरुष विदेही ॥ यह गत मोर न जाने कोई । धर्मदास तुम राखो गोईं ॥ आदि पुरुष निहअक्षर जाना । देही धर मैं प्रकटे आना ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ जुगुन २ लीन्हा अवतारा । रहों निरन्तर प्रकट पसारा ॥ सतयुग सतसुकृत कह टेरा । त्रेता नाम सुनीन्द्रहि मेरा ॥ द्वापरमें करुना मय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ चारों युगके चारों नाऊँ । माया रहित रहै तिहि ठाऊँ ॥ सो जागह पहुँचे नहिं कोई । सुर नर नाग रहै सुख गोईं ॥ सबसे कहां पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ उनका दोष कछु नहिं भाईं । धर्मराय राखे अटकाईं ॥ गुप्त पसारा है अति भारी । ताहि न जाने नर अरु नारी ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावें । और जीवकी कौन चलावें ॥ नवहिं नाम चौरासी सिद्धा । समझ बिना जगमें रहे अन्धा ॥ ऋषि मुनि और असंखन भेषा । सत्य ठौर सपने नहिं देखा ॥ जोर कहीं पतयावत नाहीं । बहुत कहीं समझा मनमाहीं ॥ कोइ योग कोइ मदके माता । कोइ कहै हम लखे विधाता ॥ कोइ मान दिशा मन लावे । मौन होयकर मूल गवावे ॥ सत्य पुरुष की युक्ति न पाईं । हृदय धरे नहिं सत्यको भाईं ॥ कोई कहै हम हैं भज नीका । काज अकाज लखै नहिं जीका ॥