कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ५९ )
अब भवमें मैं बहुरि न आऊँ । तुमरे चरणकमल चित्त लाऊँ ॥ येती युक्ति न काहू पाई । सो साहिब तुम मोहि लखाई ॥ जान परी मोहि तुम्हरी बाता । तुम सम और न कोई ताता ॥ चौरासी सो कीन्ह उबारा । बहुरि जन्म नहिं होय हमारा ॥ समझ बूझ करिहौं सिवकाई । छाँडो कुलकी लाज बड़ाई ॥ परदा तो रहिया क्षण माहीं । जगमें कोई काहू को नाहीं ॥ अपने अपने स्वारथ आई । परमारथ काहू नहिं पाई ॥ ये सब जगत निरंजन माहीं । पाँच तीन सो सब उपजाई ॥ पाँच तत्त्व तीन गुण भारी । इन ते युक्त दिखाई नारी ॥ पानी पवन पृथ्वी आकाशा । सब पर तेज किया परकाशा ॥ रज तम सत तीनों गुणजाना । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाना ॥ साखी-पाँच तीन पर अहि निरंजन, यह मायाको ठाट । तासों सब रचना करी, भांति भांतिकी घाट ॥
सद्गुरु वचन
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकासा ॥ तुम सन अन्तर कछू न राखा । जो कछुहता सो कछु सब भाखा ॥ अब तुम भक्ति करो दृढ़ताई । छाँड़ि देव कुललाज बड़ाई ॥ पहिले कुल मर्यादा खोवे । भव सो रहित भक्ति तब होवे ॥ कुल की भय सबही को भारी । कहाँ को पुरुष कहाँ की नारी ॥ ताते यम को बन्धन कीन्हा । काज अकाज न काहू चीन्हा ॥ ताते परदा दूर निवारो । सेवा करो सत्य मन धारो ॥ परदा साथ काल की गांसी । यह बन्धन दुनियाँ सब फांसी ॥ राजा परजा बड़े कुलीना । परदे काल मर्म नहिं चीन्हा ॥ सेवा करो छाँड़ि मन दूजा । गिरही सेवा गिरही पूजा ॥