कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 943, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ७६ )
सोइ संत सतगुरु सुखदासा । अजरपुरुषजहांअजरप्रकाशा॥ अनन्तकोटजाकोपार न पावे । को अस दूसरे गुरु कहावे ॥ हम तुम नारि पुर्ण सब मांहीं । जहां है सोहं तहां हम नाहीं ॥ ताहि खसम चीन्हे नर लोई । तन धर प्रगटे पुरुष न होई ॥ अकह अमान पुरुष जब रहेऊ । नाम निःअक्षर तासों भयेऊ ॥ ताहि नाम को सुमरे कोई । सुर नर मुनि इन्द्री वस होई ॥ अधर पियाला पियरस सांचा । ऐसी रहन रहे सो सांचा ॥ पियत अमीरस अधिक सुहाये । अधिक पिये पुनित्रास नसाये ॥
साखी-पांच पचीसों तीन गुण, एक मिहलमें राख ।
आदिनाम अनभय उच्चरो, तन मन धन सो चाख ॥
धन परखे धनवन्त जो, ज्ञान दृष्टि जो होय ।
आंघे गुरु विन ना सुझे, कोटकरे जो कोय ॥
चौपाई
कहे कबीर भर्म जब छूटे । मुक्ति भली सांची कर लूटे ॥
कहेऊं उपचार कछु परदा नाहीं । विन गुरु नरको सूझे नाहीं ॥
कथनी कथे कथे का होई । गुरु विन मुक्ति न कबहुं सोई ॥
शब्द रूप हमहीं होय आये । हमहीं होय कडिहार कहाये ॥
हमहीं नाम प्राण यह माहीं । हमहीं सन्त मर्द तेहि पाहीं ॥
साखी-ज्ञानदीपक सुरतकी वाती, दीनो संतन हाथ ।
दीपकलेके खोलिये, निस दिन सतगुरु साथ ॥
ज्ञान दीपक प्रकाशके, भीतर भवन उजाल ।
तहां बैठ पुरुषको सुमरो, सहजै होय निहाल ।
चौपाई
सो भजनी सबसी से ऊँचा । जोई अमर औ मतका ऊँचा ॥
यहि विधि भजन करे जो कोई । तीन लोकमें वास न होई ॥